ज्वार की खेती कैसे करें 2026: बुवाई से कटाई तक पूरी जानकारी

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 ज्वार की खेती कैसे करें: बुवाई से कटाई तक पूरी जानकारी  ज्वार की खेती भारत के कई राज्यों में पारंपरिक रूप से की जाती है, और आज भी यह एक भरोसेमंद फसल पानी जाती है। कम पानी में तैयार होने होने वाली यहफसल अनाज के साथ-साथ पशु चारे के रूप में भी उपयोगी है। बदलते मौसम और बढ़तीलगत के दौर में ज्वार की तिथि किसानों के लिए कम जोखिम और स्थिर आय देने वाला विकल्प बन रही है। अगर आप ज्वार की खेती सही तरीके से करते हैं, तो कम लागत में अच्छी पैदावार और बेहतर मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। इस खेती-बाड़ी जानकारी में हम ज्वार की खेती से जुडी पूरी जानकारी आसान भाषा में बताएंगे। 👉 कम पानी में उगने वाली फसलों की पूरी जानकारी ज्वार की खेती क्यों लाभदायक है? कम पानी में अच्छी फसल  सूखा भी सहन करने की क्षमता  अनाज और चारे दोनों के लिए उपयुक्त  बाजार में स्थिर मांग  पशुपालक किसानों के विशेष लाभदायक  इन्हीं कारणों से ज्वार की खेती छोटे और मध्यम किसानों के लिए बहुत फायदेमंद मानी जाती है। ज्वार के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी  ज्वार की खेती गर्म और शुष्क जलवायु में अच्छी होती ह...

40-45 दिन बाद धान की खेती: घास, रोग, कीट और निगरानी के लिए महत्वपूर्ण सुझाव

40-45 दिन बाद धान की खेती में ध्यान देने वाली
 बातें

40–45  दिन बाद धान की खेती



पोषक तत्वों का उपयोग

  • सल्फर: 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
  • नाइट्रोजन: 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
  • पोटाश: 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।


सिंचाई का प्रबंधन:

धान में सिंचाई व्यवस्था


पानी की गहराई 2-4 इंच तक रखें। सिंचाई को नियमित रूप से और समय पर करें।




घास (वीड्स) का नियंत्रण:

हाथ से निराई: छोटे खेतों में हाथ से घास हटाएं।

हर्बीसाइड्स: MCPA: 1 लीटर प्रति हेक्टेयर।Pretilachlor: 1 लीटर प्रति हेक्टेयर, बुबाई के 7-10 दिन बाद।



रोगों का उपचार:


धान में रोगों का उपचार



पत्ता रोग:Copper Oxychloride: 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।Blitox: 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।

झंडा रोग:Propiconazole: 1 लीटर प्रति हेक्टेयर।




कीटों का नियंत्रण:

धान में कीट नियंत्रण



लीफ फोल्डर:Chlorpyrifos: 1 लीटर प्रति हेक्टेयर।Quinalphos: 1 लीटर प्रति हेक्टेयर।

स्टेम बोरर:Cartap Hydrochloride: 1.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।Endosulfan: 1 लीटर प्रति हेक्टेयर।



खेत की निगरानी:

पौधों की नियमित जांच: पौधों की वृद्धि, रंग और स्वास्थ्य की नियमित निगरानी करें।

रोग और कीट की निगरानी: रोग और कीट के संकेतों के लिए खेत की सतत निगरानी करें और समय पर उपचार करें।

जल स्तर की निगरानी: पानी के स्तर की नियमित जाँच करें और आवश्यकतानुसार पानी की मात्रा समायोजित करें।

इन बिंदुओं का पालन करके आप 40-45 दिन के बाद धान की खेती को स्वस्थ और सफलतापूर्वक प्रबंधित कर सकते हैं।




FAQs

Q. क्या 40 दिन पर धान में रोग आ जाता है?
हां, अगर नियमित देखभाल न करें तो धान की फसल में पानी की वजह से बीमारियां आना आम बात है।

Q. कल्ले कम हों तो पोषक तत्वों का इस्तेमाल कैसे करें?
पोषक तत्वों को सही मात्रा के साथ इस्तेमाल करें।

Q. क्या धान की ग्रोथ के लिए सिंचाई महत्वपूर्ण है?
जी बिल्कुल। धान की बढ़वार के लिए सिंचाई अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन अधिक सिंचाई नुकसानदायक है।

Q. क्या धान की फसल में रोगों का इलाज संभव है?
बेहतर निगरानी और देखभाल से धान की रोगों का इलाज संभव ही नहीं, बल्कि पैदावार मैं बढ़ोतरी भी मुमकिन है।



निष्कर्ष 

40–45 दिन के बाद धान की फसल एक निर्णायक अवस्था में होती है, जहां की गई सही या गलत देखभाल सीधे पैदावार पर असर डालती है। इस समय संतुलित पोषक तत्वों का उपयोग, सही सिंचाई प्रबंधन, समय पर घास नियंत्रण तथा रोग कीटों की नियमित निगरानी करना बेहद जरूरी है। अगर किसान इस चरण में खेत पर थोड़ी अतिरिक्त सतर्कता रखें और जरूरत के अनुसार तुरंत उपचार करें तो फसल मजबूत बनती है, कल्ले अच्छी तरह निकलते हैं और आगे चलकर दाना भराव बेहतर होता है। कुल मिलाकर, 40–45 दिन की सही देखभाल ही धान की फसल को स्वस्थ, सुरक्षित और अधिक उत्पादन वाली बनाने की नींव रखती है।




⚠️ ध्यान रखें– 
👉 सिर्फ हमारे द्वारा दी गई जानकारी को सर्वोत्तम ना मानें, स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

अगर इस लेख में आपको कोई शिकायत या सुझाव हो तो दिए गए ईमेल पर मैसेज जरूर करें। धन्यवाद 🙏 
📩 jankarikhetibadi@gmail.com 



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