संदेश

अगस्त, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बाजरा की खेती: कम लागत में अधिक पैदावार और मुनाफे की पूरी जानकारी

चित्र
 🌾 बाजरा की खेती: बुवाई से कटाई तक पूरी जानकारी  को परिचय  बाजरा की खेती भारत के सूखा प्रभावित और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में किसानों के लिए वरदान मानी जाती है। यह फसल कम पानी में अच्छी पैदावार देती है, लागत कम होती है और बाजार में उसकी मांग लगातार बढ़ रही है आज के समय में जब खेती की लागत बढ़ रही है तब बाजरा की खेती किसानों के लिए सुरक्षित और लाभकारी विकल्प बनती जा रही है।  अगर आप भी बाजरा की खेती करके अच्छी उपज और मुनाफा चाहते हैं तो यह खेती-बाड़ी जानकारी आपके लिए पूरी मार्गदर्शिका है।

💦 धान की सिंचाई: पारंपरिक एवं आधुनिक तरीके

चित्र
धान की सिंचाई: महत्वपूर्ण बातें और बचाव के उपाय प्रस्तावना (Introduction) धान की खेती में सिंचाई का सही प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही समय और उचित मात्रा में सिंचाई न केवल फसल की उपज को बढ़ाने में सहायक होती है, बल्कि जल की बचत भी करती है। इस ब्लॉग में हम उन सभी आवश्यक बातों पर चर्चा करेंगे जो धान की सिंचाई के दौरान ध्यान में रखनी चाहिए। पानी की गुणवत्ता (Water Quality) साफ और मीठा पानी : धान की सिंचाई के लिए साफ और मीठा पानी सबसे उपयुक्त होता है। खारे या दूषित पानी का उपयोग फसल की वृद्धि और गुणवत्ता को नुकसान पहुँचा सकता है। जल का pH स्तर : पानी का pH स्तर 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। यह फसल के लिए सबसे अनुकूल होता है, जिससे पौधे को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं। सिंचाई के आसान तरीके (Easy Irrigation Methods) पारंपरिक बाढ़ सिंचाई : यह सबसे सामान्य विधि है जिसमें खेत को पानी से भरकर सिंचाई की जाती है। यह विधि विशेष रूप से उन क्षेत्रों में उपयुक्त है जहाँ पानी की उपलब्धता अधिक होती है। स्प्रिंकलर सिंचाई : स्प्रिंकलर विधि छोटे और मध्यम आकार के खेतों के लिए उपयुक्त है। इससे पानी की बचत ह...

20 दिन बाद की देखभाल,बम्पर पैदावार

चित्र
धान की फसल के 20 दिन बाद की देखभाल क्या है (Care for Rice Crop 20 Days After Planting धान की रोपाई के बाद 20 से 25 दिन का समय फसल के लिए निर्णायक अवस्था होती है। इस चरण में पौधों की जड़े सक्रिय होती हैं कल्ले निकलने की प्रक्रिया शुरू होती है और आगे की पूरी बढ़वार की नींव पड़ती है। यदि इस समय पानी खरपतवार पोषण और कीट रोग का सही प्रबंधनकर लिया जाए, तो फसल आगे चलकर मजबूत, संतुलित और अधिक उत्पादन देने वाली बनती है। सिंचाई और जल प्रबंधन (Irrigation and Water Management) इस अवस्था में धान के पौधों को लगातार लेकिन नियंत्रित नमी की आवश्यकता होती है सही सिंचाई कैसे करें: खेत में 2-3 सेमी तक पानी बनाए रखें  मिट्टी पूरी तरह सूख न पाए लंबे समय तक पानी भर न रहने दे  👉व्यावहारिक सुझाव:  जहां खेत में पानी रुकता हो वहां छोटे नाल या निकास जरूर बनाएं इससे जड़ों की सक्रियता बनी रहती है।  🌱खरपतवार   नियंत्रण (Weed Control) 20 से 25 दिन की व्यवस्था पर खरपतवार सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं क्योंकि इसी समय पौधों की पोषक तत्वों की मांग बढ़ जाती है।  खरपतवार से होने वाले नुकसान: ...

🥔 "आलू की खेती: बुबाई से लेकर फसल कटाई तक की संपूर्ण गाइड"

चित्र
🥔 आलू की खेती (Potato Farming)   आलू की खेती का परिचय Introduction to Potato Farming आलू एक महत्वपूर्ण खाद्य फसल है, जिसे विश्वभर में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। भारत में मुख्यतः उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, पंजाब, और गुजरात में आलू की खेती होती है। भारत आलू उत्पादन में विश्व में चौथे स्थान पर है, और यहां हर साल लगभग 50 मिलियन टन आलू का उत्पादन होता है। इस ब्लॉग में आलू की खेती के महत्वपूर्ण पहलुओं जैसे मिट्टी , जलवायु , बीज चयन , बुबाई की तकनीक , सिंचाई , पोषण प्रबंधन , कीट और रोग प्रबंधन , खुदाई , और आर्थिकता पर चर्चा करेंगे। मिट्टी और जलवायु की आवश्यकताएँ Soil and Climate Requirements मिट्टी (Soil): दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त है। मिट्टी में जल निकास अच्छा होना चाहिए। पीएच स्तर 5.2 से 6.4 के बीच होना चाहिए। जलवायु (Climate): ठंडा और शुष्क मौसम आदर्श है। दिन का तापमान 20-25°C और रात का तापमान 14-18°C के बीच होना चाहिए। उत्तर भारत में रबी सीजन , और दक्षिणी भारत में खरीफ और रबी सीजन में खेती उपयुक्त है। बीज चयन और तैयारी Seed Selection and Preparation उच्च गुणवत्ता वा...

धान की फसल में पत्ता लपेटक (Leaf Roller) की समस्या: पहचान, कारण, और प्रभावी नियंत्रण के उपाय – एक विस्तृत गाइड

चित्र
धान की फसल में पत्ता लपेटक (Leaf Roller)  – परिचय धान की फसल में पत्ता लपेटक कीट एक गंभीर समस्या है जो किसानों के लिए निरंतर चिंता का विषय बन सकता है। यह कीट पत्तियों को लपेटकर उन्हें गुथा हुआ और कांजी जैसी बनाता है, जिससे पौधे की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित होता है। 2026 में इस कीट की पहचान और समय पर नियंत्रण किसान की फसल सुरक्षा और मुनाफे के लिए बेहद जरूरी है। पत्ता लपेटक (Leaf Roller) क्या है? पत्ता लपेटक कीट का लार्वा पत्तियों को लपेटकर उनका पोषण करता है। इससे पत्तियाँ कमजोर, पीली और सूखी हो जाती हैं। गंभीर संक्रमण में पूरी फसल प्रभावित हो सकती है। लक्षण पत्तियों की लपेटने की क्रिया: पत्तियाँ गोलाकार और चिपचिपी दिखती हैं। सफेद धब्बे और छिद्र: पत्तियों पर सफेद धब्बे बनते हैं, जो कीट की गतिविधि का संकेत हैं। पत्तियों की विलुप्ति: पत्तियाँ धीरे-धीरे पीली और सूखी हो जाती हैं। कमज़ोर पौधे: संक्रमण से पौधे कमजोर और सामान्य से छोटे दिखते हैं। कारण कीट लार्वा: पत्तियों को लपेटकर खाता है और उनके पोषण को प्रभावित करता है। वातावरणीय कारक: अधिक तापमान और आर्द्रता व...

धान की फसल में रोग, बीमारियां एवं उनके ईलाज।

चित्र
धान की प्रमुख बीमारियों का इलाज: लक्षण,  कारण, दवा और जैविक उपचार धान की खेती में विभिन्न प्रकार की बीमारियों का सामना करना पड़ता है, जो फसल की उपज को प्रभावित कर सकती हैं। इन बीमारियों का सही समय पर पता लगाकर और उचित दवा या जैविक उपचार का उपयोग करके फसल को बचाया जा सकता है। इस ब्लॉग का उद्देश्य किसानों को धान की प्रमुख बीमारियों, उनके लक्षण, कारण, दवाओं और जैविक उपचार की पूरी जानकारी प्रदान करना है। ब्लास्ट रोग (Blast Disease) लक्षण : पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बे, जो बाद में बढ़कर धूसर रंग के हो जाते हैं। तना कमजोर हो जाता है, जिससे पैदावार में कमी आती है। कारण: यह रोग एक फफूंद (फंगस) द्वारा होता है, जो नमी और तापमान के बदलते मौसम में तेजी से फैलता है। दवा: ट्राइसाइक्लाजोल (0.6 ग्राम/लीटर पानी) का छिड़काव करें। इस दवा का छिड़काव 10-12 दिनों के अंतराल पर दो बार करें। जैविक उपचार: नीम तेल: नीम तेल का 5% घोल पत्तियों पर छिड़कें। नीम का तेल फफूंद को रोकने में मदद करता है। विरल एक्टिवेटर: घोड़े की खाद का काढ़ा तैयार करें और पत्तियों पर छिड़कें। यह फफूंद को नियंत्रित करता है। उपलब्ध उत...

🌾धान की सीधी बुवाई विधि (DSR)

चित्र
धान की खेती: डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) विधि डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) विधि एक आधुनिक तकनीक है जो धान की खेती को अधिक प्रभावी और संसाधन-कुशल बनाती है। इस विधि में बीजों को सीधे खेत में बोया जाता है, बिना नर्सरी में उगाए। यह विधि पानी और श्रम की बचत करने के साथ-साथ फसल की लागत को भी कम करती है। आइए, जानें DSR विधि की पूरी प्रक्रिया के बारे में। DSR क्या है? DSR का मतलब है कि धान के बीज सीधे खेत में बोए जाते हैं। इसमें बीजों को नर्सरी में उगाने की आवश्यकता नहीं होती। इससे पानी और श्रम की बचत होती है और खेती की लागत कम होती है। DSR विधि में रबी के मौसम में भी धान उगाया जा सकता है, और इसके लिए रेनगन का उपयोग किया जा सकता है। ICAR द्वारा संचालित धान की सीधी बुवाई तकनीक  फसल के लिए उपयुक्त मौसम धान की बुबाई के लिए खरीफ का मौसम सबसे अच्छा होता है, जो जून से अक्टूबर तक रहता है। इस मौसम में पर्याप्त बारिश और नमी होती है। DSR विधि में बुबाई मानसून की शुरुआत से पहले करें ताकि बीज अंकुरित हो सकें। रबी मौसम में भी धान की बुबाई की जा सकती है, और इसके लिए रेनगन का उपयोग किया जा सक...

🌾 भारत में धान की खेती : जमीन, जलवायु और उत्पादन की संपूर्ण जानकारी

चित्र
ज़मीन, जलवायु और उत्पादन की सम्पूर्ण जानकारी धान, जिसे चावल भी कहा जाता है, मक्का के बाद विश्व की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण फसल है। इसकी खेती 5000 ई.पू. में एशिया में शुरू हुई थी। आज, भारत में धान की खेती का विशेष महत्व है। इस लेख में धान की खेती के लिए उपयुक्त ज़मीन, जलवायु, बीज, और उत्पादन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जाएगी। भारत में धान की खेती भारत में धान मुख्य रूप से खरीफ फसल के रूप में उगाया जाता है। प्रमुख धान उत्पादक राज्य हैं: पश्चिम बंगाल : यहाँ की मिट्टी और जलवायु धान के लिए अनुकूल हैं। उत्तर प्रदेश : विशेष रूप से तराई क्षेत्रों में धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है। पंजाब और हरियाणा : ये राज्य धान के उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। पंजाब की रेतिली और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी धान के लिए उपयुक्त होती है, जबकि हरियाणा की काले-चर्म मिट्टी और पर्याप्त जलवायु धान की खेती के लिए आदर्श है। असम : यहाँ की जलवायु भी धान की खेती के लिए आदर्श है। धान की DSR विधि  धान के लिए उपयुक्त ज़मीन और जलवायु धान की खेती के लिए पानी की प्रचुरता आवश्यक है। आदर्श तापमान 20-35 डिग्री सेल...

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

💧 ड्रिप सिंचाई 2025 : कम पानी, ज्यादा मुनाफा

भारत में आलू की प्रमुख किस्में 2025 | कुफरी आलू बीज, उत्पादन और सही चयन गाइड

“जलवायु अनुकूल खेती 2026 – कम लागत, सुरक्षित उत्पादन और नई तकनीकें”